एस्किमो जनजाति यह आर्कटिक प्रदेशो के कठोर व ठन्डे वातावरण में रहती है जहा चारो ओर जमीन बर्फ की चादर से ढकी रहती है और दूर दूर तक सिर्फ बर्फीले पहाड़ दिखाई देते है वहा पर यह जनजाति पर्यावरण के साथ सामंजस्य बिठाने में कामयाब हुई है जहा यहाँ के स्थाई निवासी बर्फ से बने घर में रहते है जिसे इग्लू कहा जाता है और अपने भोजन के लिए यहाँ के लोग व्हेल,सील,वालरस व अन्य समुद्री जीवो पर निर्भर रहते है साथ ही ये लोग शिकार भी करते है और जानवरो के खाल से बने वस्त्र पहनते है जिसे समूर कहा जाता है । आवागमन याने की ट्रांसपोर्ट के लिए यहाँ क लोग जानवरो के खाल से ढकी छोटी छोटी नाव(नौकायान) खुले सागर में चलाते है और प्राप्त भोजन को गर्म रखने के लिए व अंधेरो में रौशनी करने के लिए समुद्री जीवो के तेल का उपयोग करते है.
आर्कटिकक्षेत्र की खास बात यह है की शीत ऋतू में सूर्य अपने क्षितिज से ऊपर नहीं आता है और अनेक महीनो तक इस क्षेत्र में रात्रि छाई रहती है जिसके कारन निराशा की स्थिति बानी रहती है ऐसे में प्रतिकूल परिस्थिति में संसाधन सिमित रहते है और इसकी इसकि प्रतिपूर्ति करने के लिए यहाँ की प्रजाति ने अद्भुत व अद्वितीय परंपरा का विकास हुआ है।
एस्किमो जनजाति की परंपरा :
सहित ऋतू की लम्बी व अँधेरी तूफानी रातो में जब भोजन का आभाव बना रहता है तब एक दिन ऐसा आता जब परिवार के सभी सदस्य सो रहे होते है तब परिवार का सबसे बड़ा(ज्येष्ठा) सदस्य अपने सबसे छोटे सदस्य के माथे को चूमता है और सभी को सोता हुआ छोड़कर चुपचाप से दबे पाँव अपने घर याने की इग्लू से बाहर निकल जाता है जहा बर्फीली हवाओ और तूफान का सामना करते हुए नंगे पाँव निशक्त होने तक सवहलता रहता है और एक अज्ञात स्थान पर पहुंच कर वह खाल से बना वस्त्र जिसे समुर कहते है उतार देता है अब उसके शरीर पर कोई आवरण नहीं रहता और बर्फिली हवाएं सीधे उसके नग्न शरीर को भेदती हुई निकलती है जिसके कारण
धीरे धीरे उसकी मृत्यु हो जाती है क्युके इस समय तापमान -50 डिग्री से भी निचे चला जाता है. एस्किमो जनजाति के बुजुर्गों को यहाँ त्याग करना पड़ता है ताकि वह उपलब्ध सिमित भोजन को अन्य सदस्यों क लिए बचा पाए और यहाँ तरीका एस्किमो जनजाति द्वारा न्यायोचित भी ठहराया गया है।